विस्तृत उत्तर
स्कंद पुराण के काशी खंड (अध्याय 53) में स्पष्ट उल्लेख है कि जो व्यक्ति अण्डाकार कुक्कुटेश्वर लिंग की पूजा करता है, उसे समस्त सुख प्राप्त होते हैं और उसे पुनः गर्भ-वास (Womb residence) नहीं करना पड़ता। चूँकि यह लिंग अण्डाकार है, जो जन्म के मूल स्रोत और ब्रह्मांडीय गर्भाशय का प्रतीक है, इसकी चेतना के साथ पूजा करने से साधक उत्पत्ति के मूल रहस्य को भेद लेता है। परिणामस्वरूप जीवात्मा भौतिक जन्म-मरण के अनंत चक्र से मुक्त हो जाती है और उसे 'कैवल्य मोक्ष' प्राप्त होता है। यह लिंग साधक को पाशविक वृत्तियों से निकालकर निर्मल शिव-चेतना में प्रतिष्ठित कर देता है, जिससे आवागमन का भय सर्वदा के लिए समाप्त हो जाता है।





