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विस्तृत उत्तर
तीसरे दिन के पिण्डदान से प्रेत के पिण्डज शरीर का हृदय और वक्षस्थल, अर्थात छाती, बनते हैं। यदि कृत्य यहाँ रुक जाए, तो शरीर केवल गर्दन तक ही सीमित रह जाता है। इसलिए दस दिनों तक पिण्डदान का क्रम पूरा करना आवश्यक माना गया है।
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