विस्तृत उत्तर
त्रिपुरसुंदरी साधना — श्रीविद्या की सर्वोच्च देवी की उपासना:
त्रिपुरसुंदरी — परिचय
त्रिपुरसुंदरी = ललिता = राज-राजेश्वरी = षोडशी। दशमहाविद्याओं में तृतीय और श्रीविद्या परंपरा में सर्वोच्च। ये 'तीनों लोकों (त्रि-पुर) में सुंदरी' हैं — सौन्दर्य, प्रेम, और दिव्य-आनंद की देवी।
ललितासहस्रनाम — त्रिपुरसुंदरी का स्वरूप
श्री माता श्री महाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी।
चिदग्निकुण्डसंभूता देवकार्यसमुद्यता।।'
— श्री माता, महाराज्ञी, सिंहासन-ईश्वरी, चिदग्नि-कुण्ड से उत्पन्न।
त्रिपुरसुंदरी-साधना के अंग
1मंत्र
- ▸पंचदशाक्षरी (15 अक्षर): 'क ए ई ल ह्रीं — ह स क ह ल ह्रीं — स क ल ह्रीं' — श्रीविद्या का मूल मंत्र। गुरु-दत्त ही ग्राह्य।
- ▸षोडशी मंत्र (16 अक्षर): पंचदशाक्षरी + एक बीज = षोडशाक्षरी — उच्चतम। केवल सर्वोच्च दीक्षा में।
2यंत्र
श्री यंत्र (श्री चक्र) — त्रिपुरसुंदरी का यंत्र। 9 त्रिकोण, 43 छोटे त्रिकोण, और बिंदु — ब्रह्माण्ड के स्वरूप का प्रतीक।
3काल और वस्त्र
- ▸शुक्रवार, पूर्णिमा, नवरात्रि
- ▸लाल रेशमी वस्त्र — सम्पूर्ण
4ध्यान-स्वरूप (तंत्रराज तंत्र)
बाला (16 वर्षीया), रक्तवर्णा, नेत्र-तरंग से ब्रह्मांड को जागृत करने वाली, पाश-अंकुश-धनुष-बाण-धारिणी, सिंहासन पर आसीन।
5पुरश्चरण
15 लाख जप (15 अक्षर × 1 लाख)
6भोग
खीर, मिष्ठान्न, लाल पुष्प, पान-सुपारी।
त्रिपुरसुंदरी-साधना की विशेषता
परशुराम कल्पसूत्र: यह 'सौम्य तंत्र' है — शांत, सात्विक, और अत्यंत फलदायी। काली-भैरव की तरह उग्र नहीं। नित्य जप करने वाले को सौंदर्य, लक्ष्मी, विद्या, और मोक्ष — चारों मिलते हैं।
श्रीविद्या और त्रिपुरसुंदरी
तंत्रालोक: 'श्रीविद्या = त्रिपुरसुंदरी की विद्या।' श्रीविद्या उपासना का केंद्र यही देवी हैं।
