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शास्त्र ज्ञान📜 कठोपनिषद 6/10-11, श्वेताश्वतर उपनिषद 2/8-13, मैत्र्युपनिषद 6/18, बृहदारण्यक 4/4/232 मिनट पठन

उपनिषद में योग का वर्णन कैसे है?

संक्षिप्त उत्तर

कठोपनिषद (6/10-11) — 'इंद्रियों की स्थिर धारणा ही योग है।' श्वेताश्वतर उपनिषद (2/8-13) में योग की विस्तृत विधि — एकांत स्थान, सीधी रीढ़, प्राण-नियंत्रण और ब्रह्म-चिंतन। मैत्र्युपनिषद (6/18) में षडंग योग बताया गया है।

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विस्तृत उत्तर

## उपनिषद में योग का वर्णन

उपनिषदों में योग — ब्रह्म-साक्षात्कार का विज्ञान

उपनिषदों में योग केवल आसन नहीं — यह चित्त की सम्पूर्ण एकाग्रता और आत्म-साक्षात्कार की विधि है।

कठोपनिषद (6/10-11) — योग की परिभाषा

*'यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।

बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम्।।'*

— जब पाँचों इंद्रियाँ मन सहित स्थिर हो जाएं और बुद्धि भी चेष्टा न करे — उस अवस्था को परम गति (समाधि) कहते हैं।

*'तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।'*

— इंद्रियों की स्थिर धारणा को ही योग मानते हैं।

श्वेताश्वतर उपनिषद (2/8-13) — योग की विधि

यह उपनिषद योग की विस्तृत व्यावहारिक विधि देता है:

  • एकांत, शांत स्थान का चयन
  • शरीर को सीधा रखें — गर्दन, सिर, वक्ष एक रेखा में
  • इंद्रियों को मन में, मन को ब्रह्म में लय करें
  • प्राण-नियंत्रण द्वारा मन को शांत करें
  • ध्यान में ब्रह्म के प्रकाश का साक्षात्कार करें

मैत्र्युपनिषद (6/18) — षडंग योग

प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, तर्क और समाधि — ये छः योग के अंग।

योग के फल (श्वेताश्वतर 2/12-13)

  • पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश — पाँच तत्त्वों के प्रतीक अनुभव
  • रोग-रहित, जरा-रहित शरीर
  • अंततः ब्रह्म-साक्षात्कार का प्रकाश

योग और ज्ञान का समन्वय

उपनिषदों में योग, ज्ञान और भक्ति — तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। योग बाह्य-शरीर को तैयार करता है, ज्ञान बुद्धि को और भक्ति हृदय को।

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शास्त्रीय स्रोत
कठोपनिषद 6/10-11, श्वेताश्वतर उपनिषद 2/8-13, मैत्र्युपनिषद 6/18, बृहदारण्यक 4/4/23
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