विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में योग का वर्णन
उपनिषदों में योग — ब्रह्म-साक्षात्कार का विज्ञान
उपनिषदों में योग केवल आसन नहीं — यह चित्त की सम्पूर्ण एकाग्रता और आत्म-साक्षात्कार की विधि है।
कठोपनिषद (6/10-11) — योग की परिभाषा
*'यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।
बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम्।।'*
— जब पाँचों इंद्रियाँ मन सहित स्थिर हो जाएं और बुद्धि भी चेष्टा न करे — उस अवस्था को परम गति (समाधि) कहते हैं।
*'तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।'*
— इंद्रियों की स्थिर धारणा को ही योग मानते हैं।
श्वेताश्वतर उपनिषद (2/8-13) — योग की विधि
यह उपनिषद योग की विस्तृत व्यावहारिक विधि देता है:
- ▸एकांत, शांत स्थान का चयन
- ▸शरीर को सीधा रखें — गर्दन, सिर, वक्ष एक रेखा में
- ▸इंद्रियों को मन में, मन को ब्रह्म में लय करें
- ▸प्राण-नियंत्रण द्वारा मन को शांत करें
- ▸ध्यान में ब्रह्म के प्रकाश का साक्षात्कार करें
मैत्र्युपनिषद (6/18) — षडंग योग
प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, तर्क और समाधि — ये छः योग के अंग।
योग के फल (श्वेताश्वतर 2/12-13)
- ▸पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश — पाँच तत्त्वों के प्रतीक अनुभव
- ▸रोग-रहित, जरा-रहित शरीर
- ▸अंततः ब्रह्म-साक्षात्कार का प्रकाश
योग और ज्ञान का समन्वय
उपनिषदों में योग, ज्ञान और भक्ति — तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। योग बाह्य-शरीर को तैयार करता है, ज्ञान बुद्धि को और भक्ति हृदय को।





