विस्तृत उत्तर
वास्तु शास्त्र के प्राचीन ग्रंथों — बृहत् संहिता (वराहमिहिर), मयमतम्, और समरांगण सूत्रधार — में मुख्य द्वार की दिशा और स्थिति के विस्तृत नियम दिए गए हैं।
सर्वश्रेष्ठ दिशाएं
- 1पूर्व दिशा — सर्वाधिक शुभ मानी जाती है। सूर्य की ऊर्जा का सीधा प्रवेश होता है। ज्ञान, स्वास्थ्य और यश प्रदान करता है।
- 2उत्तर दिशा — कुबेर (धन देवता) की दिशा होने के कारण धन-समृद्धि के लिए शुभ है।
- 3ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) — अत्यंत शुभ माना जाता है, परंतु मुख्य द्वार ठीक कोने पर नहीं बल्कि ईशान क्षेत्र में उत्तर या पूर्व की दीवार पर होना चाहिए।
अन्य दिशाओं का प्रभाव
- ▸दक्षिण दिशा — सामान्यतः अशुभ माना जाता है, परंतु वास्तु विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि पद (भूखंड विभाजन) सही हो तो दक्षिण में भी द्वार शुभ हो सकता है। यह एकतरफा अशुभ नहीं है।
- ▸पश्चिम दिशा — मध्यम फल देता है। व्यापारियों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
वास्तु पद विभाजन
वास्तु शास्त्र में प्रत्येक दिशा को 9 पदों (भागों) में बांटा जाता है और प्रत्येक पद का अपना स्वामी देवता होता है। द्वार का शुभाशुभ केवल दिशा से नहीं बल्कि उस दिशा के किस पद में द्वार है, इससे निर्धारित होता है। उदाहरणार्थ:
- ▸पूर्व में जयंत, इंद्र, सूर्य पद शुभ हैं।
- ▸उत्तर में कुबेर, मुख्य पद शुभ हैं।
विशेष ध्यान
- ▸मुख्य द्वार अन्य द्वारों से बड़ा और सुसज्जित होना चाहिए।
- ▸द्वार के सामने कोई बाधा (खंभा, वृक्ष, कोना) नहीं होनी चाहिए — इसे 'वेध दोष' कहते हैं।
- ▸दो मुख्य द्वार आमने-सामने नहीं होने चाहिए।





