विस्तृत उत्तर
भक्ति के मार्ग में अनेक बाधाएँ हैं, परंतु शास्त्र और संत-परंपरा में कुछ मुख्य बाधाओं का विशेष उल्लेख है।
सबसे बड़ी बाधा है अहंकार — 'मैं' की भावना। जब तक जीव 'मैं' को सर्वस्व मानता है, वह भगवान के समक्ष पूर्ण समर्पण नहीं कर पाता। भक्ति का अर्थ ही है अपने अहंकार को भगवान के चरणों में अर्पित करना।
दूसरी बाधा है विषय-वासना — मन का संसार के सुखों में लीन रहना। जब मन सदा धन, भोग, मान-सम्मान में उलझा रहता है, तो उसमें भगवान के लिए स्थान नहीं रहता।
तीसरी बाधा है अश्रद्धा — 'भगवान हैं या नहीं', 'भक्ति काम करती है या नहीं' — ऐसे संशय भक्ति को नष्ट करते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है — 'संशयात्मा विनश्यति' — संशयात्मा का विनाश होता है।
चौथी बाधा है कुसंग — जो लोग ईश्वर की निंदा करते हों, भक्ति को ढकोसला मानते हों, उनकी संगति भक्ति को कमजोर करती है।
पाँचवीं बाधा है अधीरता — भक्ति का फल शीघ्र न दिखे तो मन उठ जाता है। शास्त्र कहते हैं कि भक्ति की परिपक्वता के लिए धैर्य और निरंतरता आवश्यक है।
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा है कि भगवान से प्रेम के लिए नौ गुणों — कुल, धर्म, बड़ाई, धन, चतुरता आदि — की नहीं, केवल भक्ति की आवश्यकता है।





