विस्तृत उत्तर
इस प्रश्न का उत्तर स्वयं भगवान ने गीता में दिया है — और वह आश्चर्यजनक रूप से सरल है।
गीता का उत्तर — श्रीकृष्ण कहते हैं (9.26): 'पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।' — जो भी मुझे एक पत्ता, फूल, फल या जल भी भक्तिभाव से अर्पित करे — मैं उसे प्रेम से स्वीकार करता हूँ।
सबसे आसान और गहरा तरीका — नाम-जप। अपने इष्टदेव का नाम बार-बार लेना — बैठे, चलते, काम करते — यह सबसे सुलभ और सबसे शक्तिशाली है। 'राम राम', 'हरे कृष्ण', 'ओम नमः शिवाय' — कोई भी नाम। कलियुग में नाम-जप को सर्वश्रेष्ठ साधन माना गया है।
सेवा — दूसरों की सहायता करना — 'जीव में शिव देखना' — भगवान सबसे जल्दी तब प्रसन्न होते हैं जब उनके किसी प्राणी की सच्ची सेवा की जाए।
सच बोलना और धर्म पर चलना — भगवान महादेव को 'सत्यं शिवं सुंदरम्' कहा जाता है। सत्य आचरण स्वयं पूजा है।
प्रेम — तुलसी, मीरा, सूर — इन भक्तों ने कोई बड़ा अनुष्ठान नहीं किया, बस प्रेम किया। भगवान को प्रेम सबसे अधिक प्रिय है।
किसी को कष्ट न देना — 'अहिंसा परमो धर्मः' — किसी का दिल न दुखाना, किसी को पीड़ा न देना — यह भी भगवान की पूजा है।
संक्षेप में — विशाल मंदिर, महँगी सामग्री, जटिल अनुष्ठान के बिना भी — केवल प्रेम, सत्य, सेवा और नाम-जप से भगवान प्रसन्न होते हैं।





