विस्तृत उत्तर
भैरव भगवान शिव का सबसे उग्र और रौद्र रूप है। शिव पुराण के अनुसार भैरवनाथ शिव का पांचवां अवतार माने जाते हैं। वे अष्टभैरवों (आठ भैरवों) में प्रमुख हैं और काशी के कोतवाल कहलाते हैं।
पूजा का समय
- ▸कालाष्टमी (कृष्ण पक्ष अष्टमी): प्रत्येक माह — भैरव पूजा का मुख्य दिन।
- ▸काल भैरव जयंती: मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी — वार्षिक महापर्व।
- ▸रात्रि पूजा: भैरव की पूजा विशेष रूप से रात्रि में (अर्धरात्रि) की जाती है।
- ▸रविवार या मंगलवार: शुभ दिन।
पूजा विधि (शोध आधारित — अमर उजाला/पत्रिका)
- 1प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- 2भैरव प्रतिमा/चित्र के सामने दीपक (सरसों तेल का) जलाएं।
- 3काले तिल, उड़द, सरसों का तेल अर्पित करें।
- 4नारियल, नींबू अर्पित करें।
- 5गेंदे के फूल विशेष रूप से अर्पित करें।
- 6'ॐ कालभैरवाय नमः' या 'ॐ बटुकभैरवाय नमः' मंत्र 108 बार जपें।
- 7काल भैरव अष्टक (शंकराचार्य रचित — 'काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे') का पाठ।
- 8भैरव चालीसा या भैरव स्तोत्र का पाठ।
- 9काले कुत्ते को भोजन: भैरव का वाहन श्वान (कुत्ता) है — काले कुत्ते को भोजन कराना अत्यंत शुभ।
लाभ
- ▸अकाल मृत्यु भय से मुक्ति।
- ▸शत्रु नाश, बुरी शक्तियों से रक्षा।
- ▸तंत्र बाधा निवारण।
- ▸कालसर्प दोष शांति।
- ▸न्यायालय/कानूनी विवादों में विजय।
ध्यान: काशी में विश्वनाथ दर्शन से पहले काल भैरव के दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है — बिना काल भैरव दर्शन के विश्वनाथ पूजा अधूरी है।




