विस्तृत उत्तर
समर्पण भक्ति का सर्वोच्च रूप है। नवधा भक्ति में इसे 'आत्मनिवेदन' कहते हैं — अपना सर्वस्व भगवान को अर्पित करना। यह केवल बाहरी क्रिया नहीं — यह एक आंतरिक अवस्था है।
समर्पण का अर्थ है — अपना शरीर, मन, बुद्धि, कर्म और फल सब भगवान को सौंप देना। 'मैं करता हूँ' की बजाय 'भगवान करा रहे हैं' — यह भाव समर्पण है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं — 'यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।' — जो कुछ करो, खाओ, दो, तप करो — वह सब मुझे अर्पित करो।
समर्पण कैसे करें —
पहला — हर कार्य को भगवान की सेवा मानकर करें। रोटी पकाते समय भी भगवान को भोग लगाने का भाव रखें।
दूसरा — अपनी समस्याएं, चिंताएं और भय भगवान को सौंप दें। 'प्रभु, यह समस्या अब तुम्हारी है, मुझे विश्वास है' — यह समर्पण की भाषा है।
तीसरा — फल की चिंता न करें। जो निर्णय लें, भगवान पर छोड़ दें। परिणाम भगवान की मर्जी पर।
चौथा — प्रतिदिन संध्याकाल में अपने दिन के सभी कर्म भगवान के चरणों में समर्पित करें — 'आज जो कुछ हुआ, वह तुम्हारी लीला थी।'
समर्पण का सर्वोच्च उदाहरण महाराज बलि हैं — नवधा भक्ति में आत्मनिवेदन के आदर्श भक्त वही माने गए हैं।





