विस्तृत उत्तर
भूमि पूजन (भूमि शोधन/भूम्यारंभ संस्कार) किसी भी निर्माण कार्य से पहले अनिवार्य विधि है। गृह्यसूत्रों और वास्तु शास्त्र में विभिन्न देवताओं के पूजन का विधान है।
प्रमुख देवता जिनकी पूजा अनिवार्य है
- 1श्री गणेश — सर्वप्रथम विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा। किसी भी शुभ कार्य का आरंभ गणपति पूजन से होता है।
- 1भूमि देवी (पृथ्वी माता) — भूमि की अधिष्ठात्री देवी। 'ॐ भूम्यै नमः' मंत्र से पूजन। अथर्ववेद में पृथ्वी सूक्त (12.1) भूमि देवी की स्तुति है।
- 1वास्तु पुरुष — वास्तु के अधिष्ठाता देवता। 'ॐ वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मान्...' (ऋग्वेद 7.54.1) मंत्र से पूजन।
- 1अष्ट दिक्पाल — आठ दिशाओं के स्वामी देवता:
- ▸पूर्व — इंद्र
- ▸आग्नेय — अग्नि
- ▸दक्षिण — यम
- ▸नैऋत्य — निऋति
- ▸पश्चिम — वरुण
- ▸वायव्य — वायु
- ▸उत्तर — कुबेर
- ▸ईशान — ईशान (शिव)
- 1नवग्रह — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु — इन नवग्रहों की स्थापना और पूजन।
- 1पंचलोकपाल — ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, गणेश — कुछ परंपराओं में इनका पूजन होता है।
- 1नाग देवता (सर्प) — भूमि के भीतर निवास करने वाले नाग देवता को शांत करने हेतु। अनंत नाग या वासुकि की पूजा।
- 1विश्वकर्मा — देवशिल्पी और वास्तु के आदि गुरु। निर्माण कार्य के संरक्षक देवता।
भूमि पूजन की संक्षिप्त विधि
- 1शुभ मुहूर्त में ईशान कोण से आरंभ।
- 2भूमि पर गोबर का लेपन और गंगाजल छिड़काव।
- 3गणपति पूजन → कलश स्थापना → नवग्रह पूजन → वास्तु पुरुष पूजन → दिक्पाल पूजन → भूमि देवी पूजन।
- 4हवन — वास्तु शांति मंत्रों से आहुतियां।
- 5भूमि खनन — ईशान कोण में पहली कुदाल/खनन।
- 6पूर्णाहुति और प्रसाद वितरण।
ध्यान दें: संपूर्ण विधि किसी योग्य पुरोहित/पंडित से कराएं। क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार कुछ अतिरिक्त देवताओं की पूजा भी हो सकती है।





