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विस्तृत उत्तर
दसवें दिन के पिण्डदान से प्रेत का पिण्डज शरीर पूर्ण रूप से संघटित हो जाता है। इस दिन तक सिर, गर्दन, कंधे, हृदय, वक्षस्थल, पीठ, नाभि, कटि, जांघें, घुटने और पैर बन चुके होते हैं। पूर्ण शरीर प्राप्त होते ही आत्मा में भयंकर भूख और प्यास, अर्थात क्षुधा और पिपासा, जाग्रत होती है। दसवें दिन अशुद्धि का प्रारंभिक चरण भी समाप्त माना जाता है।
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