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ध्यान साधना📜 पतंजलि योगसूत्र 3/2, भगवद गीता 6/10-15, श्वेताश्वतर उपनिषद 2/8-12, माण्डूक्योपनिषद2 मिनट पठन

ध्यान क्या होता है और इसे कैसे करें?

संक्षिप्त उत्तर

ध्यान वह अवस्था है जिसमें चित्त बिना भटके एक विषय पर टिका रहे (योगसूत्र 3/2)। विधि — शांत स्थान, सीधा आसन, श्वास-साधना, फिर ओम्/इष्टदेव/श्वास पर एकाग्रता। गीता (6/15) के अनुसार नियमित ध्यान से परम शांति और निर्वाण मिलता है।

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विस्तृत उत्तर

## ध्यान क्या होता है और इसे कैसे करें?

ध्यान की परिभाषा

पतंजलि योगसूत्र (3/2) में कहा गया है:

*'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।'*

— किसी एक विषय पर चित्त का अविच्छिन्न, एकाग्र प्रवाह ही ध्यान है।

सामान्य भाषा में — ध्यान वह अवस्था है जिसमें मन बाहरी विषयों से हटकर एक ही बिंदु पर टिका रहता है — बिना भटके, बिना प्रयास के।

ध्यान और साधारण एकाग्रता में अंतर

  • एकाग्रता में प्रयास होता है; ध्यान में प्रयास स्वयं शांत हो जाता है
  • एकाग्रता धारणा है (योग का 6वाँ अंग); ध्यान 7वाँ अंग है
  • ध्यान का पूर्ण रूप समाधि है (8वाँ अंग)

ध्यान की सरल विधि (गीता 6/10-15 पर आधारित)

### चरण 1: स्थान

शांत, एकांत, स्वच्छ स्थान चुनें। पूजाघर, नदी-तट, बगीचा — जहाँ मन को बाह्य विक्षेप न हो।

### चरण 2: आसन

पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन में बैठें। रीढ़, गर्दन और सिर एक सीधी रेखा में। कुशा, मृगछाल या सूती आसन पर बैठें।

### चरण 3: श्वास-साधना

आँखें मृदुता से बंद करें। तीन-पाँच बार गहरी साँस लें और धीरे-धीरे छोड़ें। शरीर को शिथिल होने दें।

### चरण 4: ध्यान का विषय

किसी एक विषय पर मन को टिकाएं:

  • ओम्-नाद — भीतर 'ओम्' की गूँज
  • इष्टदेव का रूप — हृदय में श्रीकृष्ण, राम, शिव आदि का दिव्य स्वरूप
  • श्वास — आती-जाती साँस की अनुभूति
  • भ्रूमध्य — आँखों के बीच ज्योतिबिंदु

### चरण 5: मन भटके तो

जब भी मन भटके — बिना खीझे, धीरे से ध्येय पर वापस लाएं। यही अभ्यास है।

### चरण 6: समापन

15-20 मिनट बाद धीरे-धीरे आँखें खोलें। हथेलियाँ रगड़कर आँखों पर रखें। 'ओम् शांति' बोलकर समापन करें।

ध्यान का नित्य अभ्यास

गीता (6/15) — *'युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।'*

— नियमित ध्यान से परम शांति और निर्वाण की प्राप्ति होती है।

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शास्त्रीय स्रोत
पतंजलि योगसूत्र 3/2, भगवद गीता 6/10-15, श्वेताश्वतर उपनिषद 2/8-12, माण्डूक्योपनिषद
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