विस्तृत उत्तर
## ध्यान क्या होता है और इसे कैसे करें?
ध्यान की परिभाषा
पतंजलि योगसूत्र (3/2) में कहा गया है:
*'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।'*
— किसी एक विषय पर चित्त का अविच्छिन्न, एकाग्र प्रवाह ही ध्यान है।
सामान्य भाषा में — ध्यान वह अवस्था है जिसमें मन बाहरी विषयों से हटकर एक ही बिंदु पर टिका रहता है — बिना भटके, बिना प्रयास के।
ध्यान और साधारण एकाग्रता में अंतर
- ▸एकाग्रता में प्रयास होता है; ध्यान में प्रयास स्वयं शांत हो जाता है
- ▸एकाग्रता धारणा है (योग का 6वाँ अंग); ध्यान 7वाँ अंग है
- ▸ध्यान का पूर्ण रूप समाधि है (8वाँ अंग)
ध्यान की सरल विधि (गीता 6/10-15 पर आधारित)
### चरण 1: स्थान
शांत, एकांत, स्वच्छ स्थान चुनें। पूजाघर, नदी-तट, बगीचा — जहाँ मन को बाह्य विक्षेप न हो।
### चरण 2: आसन
पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन में बैठें। रीढ़, गर्दन और सिर एक सीधी रेखा में। कुशा, मृगछाल या सूती आसन पर बैठें।
### चरण 3: श्वास-साधना
आँखें मृदुता से बंद करें। तीन-पाँच बार गहरी साँस लें और धीरे-धीरे छोड़ें। शरीर को शिथिल होने दें।
### चरण 4: ध्यान का विषय
किसी एक विषय पर मन को टिकाएं:
- ▸ओम्-नाद — भीतर 'ओम्' की गूँज
- ▸इष्टदेव का रूप — हृदय में श्रीकृष्ण, राम, शिव आदि का दिव्य स्वरूप
- ▸श्वास — आती-जाती साँस की अनुभूति
- ▸भ्रूमध्य — आँखों के बीच ज्योतिबिंदु
### चरण 5: मन भटके तो
जब भी मन भटके — बिना खीझे, धीरे से ध्येय पर वापस लाएं। यही अभ्यास है।
### चरण 6: समापन
15-20 मिनट बाद धीरे-धीरे आँखें खोलें। हथेलियाँ रगड़कर आँखों पर रखें। 'ओम् शांति' बोलकर समापन करें।
ध्यान का नित्य अभ्यास
गीता (6/15) — *'युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।'*
— नियमित ध्यान से परम शांति और निर्वाण की प्राप्ति होती है।





