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ग्रहण📜 धर्मसिन्धु, स्मृति ग्रंथ, आयुर्वेद2 मिनट पठन

ग्रहण काल में कुश का प्रयोग क्यों करते हैं

संक्षिप्त उत्तर

ग्रहण में कुश: कुश = सर्वाधिक पवित्र तृण, सात्विक ऊर्जा। भोजन/जल पर रखने से ग्रहण का दूषित प्रभाव निष्प्रभ। तुलसी पत्र भी साथ। कुश पवित्री पहनकर जप। मान्यता: कुश नकारात्मक ऊर्जा अवशोषित करता है। बिना कुश का भोजन ग्रहण बाद त्याज्य (कुछ परम्पराओं में)।

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विस्तृत उत्तर

सूर्य/चन्द्र ग्रहण काल में भोजन, जल, औषधि आदि पर कुश (दर्भ) घास रखने की प्राचीन परम्परा है।

कारण

1शास्त्रीय

कुश (दर्भ) को सनातन धर्म में सर्वाधिक पवित्र तृण (घास) माना गया है। इसमें सात्विक ऊर्जा और रक्षात्मक गुण हैं। ग्रहण काल में वातावरण में सूक्ष्म अशुद्धि/नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है (शास्त्रीय मान्यता) — कुश इसे अवशोषित/निष्प्रभ करता है।

2भोजन/जल रक्षा

  • ग्रहण काल में पके भोजन, दूध, दही, अचार, जल आदि पर कुश रखने से ग्रहण का दूषित प्रभाव नहीं पड़ता।
  • ग्रहण के बाद कुश हटाकर भोजन प्रयोग करें।
  • बिना कुश रखा भोजन ग्रहण के बाद त्याग दें (कुछ परम्पराओं में)।

3तुलसी पत्र

कुश के साथ तुलसी पत्र भी रखा जाता है — दोनों मिलकर रक्षा कवच।

4आयुर्वेदिक दृष्टि

कुछ आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार कुश में जीवाणुरोधी (antibacterial) गुण हैं, और यह वातावरण की शुद्धि में सहायक।

5पूजा में कुश

ग्रहण काल में मंत्र जप, तर्पण, दान — सभी में कुश अनिवार्य। कुश की पवित्री (अंगूठी) पहनकर जप करें।

ध्यान दें: ग्रहण सम्बन्धी नियम परम्परागत मान्यताओं पर आधारित हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से ग्रहण एक खगोलीय घटना है।

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शास्त्रीय स्रोत
धर्मसिन्धु, स्मृति ग्रंथ, आयुर्वेद
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