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ग्रहण📜 धर्मसिन्धु, स्मृति ग्रंथ2 मिनट पठन

चंद्र ग्रहण में पूजा और जप कैसे करें

संक्षिप्त उत्तर

चन्द्र ग्रहण: सूतक ~9 घंटे पूर्व। भोजन पर कुश+तुलसी। स्नान → कुश आसन → गायत्री/सोम मंत्र/महामृत्युंजय जप → ध्यान। मोक्ष बाद: स्नान → पूजा → दान → ब्राह्मण भोजन। भोजन/शयन वर्जित (ग्रहण काल)। जप = लाख गुना फल।

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विस्तृत उत्तर

चन्द्र ग्रहण (पूर्णिमा को) में विशेष पूजा-जप विधान है।

ग्रहण पूर्व

  • सूतक काल (ग्रहण से ~9 घंटे पूर्व) आरम्भ — भोजन बनाना/खाना बन्द।
  • पके भोजन, दूध, जल पर कुश + तुलसी रखें।
  • गर्भवती स्त्रियाँ विशेष सावधानी रखें (परम्परागत मान्यता)।

ग्रहण काल में

  1. 1स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें।
  2. 2कुश आसन पर बैठें, कुश पवित्री धारण।
  3. 3मंत्र जप:
  • गायत्री मंत्र (सर्वोत्तम)।
  • 'ॐ सोमाय नमः' या 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः'।
  • महामृत्युंजय मंत्र।
  • इष्टदेवता मंत्र।
  1. 1ध्यान और मौन।
  2. 2दान का संकल्प।

ग्रहण मोक्ष (समाप्ति) के बाद

  1. 1तुरन्त स्नान (गंगाजल मिलाकर)।
  2. 2देवताओं की पूजा।
  3. 3दान — अन्न, वस्त्र, धन, तिल।
  4. 4ब्राह्मण भोजन।
  5. 5कुश + तुलसी हटाकर भोजन/जल प्रयोग।

क्या न करें

  • ग्रहण काल में भोजन, जल पान (परम्परागत नियम)।
  • शयन, मैथुन।
  • चन्द्रमा को नग्न नेत्रों से देखने में कोई हानि नहीं (सूर्य ग्रहण में सावधानी अनिवार्य)।

ध्यान दें: गर्भवती स्त्रियों सम्बन्धी ग्रहण नियम परम्परागत मान्यताएँ हैं, वैज्ञानिक प्रमाण नहीं।

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शास्त्रीय स्रोत
धर्मसिन्धु, स्मृति ग्रंथ
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