विस्तृत उत्तर
इस मंत्र का केंद्रीय दर्शन 'उर्वारुकमिव बन्धनान्' रूपक में समाहित है। जब ककड़ी या खरबूजा कच्चा होता है, तो वह अपनी बेल (डंठल) से अत्यंत मजबूती से जुड़ा होता है। उसे बलपूर्वक तोड़ने पर वह टूट तो जाता है, परंतु डंठल का कुछ हिस्सा फल के साथ रह जाता है या बेल को क्षति पहुंचती है। परंतु जब फल पूर्णतः पक जाता है, तो वह बिना किसी बाहरी बल या प्रयास के, अत्यंत सहजता से बेल से अलग हो जाता है।
साधक भगवान शिव से यह प्रार्थना करता है कि जब उसका भौतिक शरीर रूपी फल आयु रूपी बेल पर पक जाए (अर्थात् आयु पूर्ण हो जाए), तो प्राणों का त्याग किसी भी शारीरिक पीड़ा, रोग या मृत्यु के भय के बिना, उसी ककड़ी की भांति अत्यंत सहज हो।
मृत्यु एक नैसर्गिक प्रक्रिया है, परंतु 'मृत्यु का भय' अज्ञान का परिणाम है। यह मंत्र मृत्यु को टालने का नहीं, अपितु 'मृत्यु के भय' पर विजय प्राप्त करने का मंत्र है।





