विस्तृत उत्तर
जब किसी अत्यंत गंभीर रोग, असाध्य व्याधि, अथवा अकाल मृत्यु के योग का निवारण करना हो, तब तंत्र-शास्त्रों और 'नेत्र तंत्र' जैसे ग्रंथों के आधार पर इस मंत्र का 'सम्पुटित' या 'तांत्रिक स्वरूप' प्रयुक्त किया जाता है।
तांत्रिक विधि में मंत्र के आदि और अंत में विशिष्ट 'बीज मंत्रों' (हौं, जूं, सः) और 'व्याहृतियों' (भूर्भुवः स्वः) का प्रयोग किया जाता है। बीज मंत्र ब्रह्मांडीय ऊर्जा के सघन कैप्सूल होते हैं, जो मुख्य मंत्र की शक्ति को कई गुना बढ़ा देते हैं और साधक के चारों ओर एक अभेद्य मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक कवच का निर्माण करते हैं।
सम्पुटित तांत्रिक स्वरूप:
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ
इस तांत्रिक स्वरूप में प्रयुक्त बीज मंत्रों का विशेष क्रम मंत्र की ऊर्जा को पहले ऊपर की ओर (आरोहण) और फिर नीचे की ओर (अवरोहण) प्रवाहित करता है, जिससे ऊर्जा साधक के सूक्ष्म शरीर में पूर्णतः स्थिर हो जाती है।
