विस्तृत उत्तर
जप में ध्यान के विषय का वर्णन भागवत पुराण और भगवद् गीता में मिलता है:
तीन स्तरों पर ध्यान
1रूप ध्यान (प्रारंभिक साधक)
इष्ट देव का सुंदर स्वरूप — विस्तार से:
- ▸चरणों से प्रारंभ — नखों की आभा
- ▸ऊपर जाएं — घुटने, कमर, हृदय
- ▸मुख पर रुकें — नेत्र, मुस्कान, मुकुट
- ▸देव की दृष्टि — आप पर करुणा भाव
2गुण ध्यान (मध्यम साधक)
रूप से आगे — देव के गुणों का ध्यान:
- ▸शिव = 'कल्याण, चेतना, मोक्ष'
- ▸विष्णु = 'पालन, क्षमा, प्रेम'
- ▸देवी = 'शक्ति, माँ का ममत्व'
3तत्व ध्यान (उन्नत साधक)
भगवद् गीता: 'ब्रह्मण्याधाय कर्माणि' — सब कुछ ब्रह्म में समर्पित। देव = ब्रह्म = अपनी आत्मा = सब कुछ।
नवधा भक्ति में ध्यान
भागवत 7.5.23 — 'स्मरणम्' तृतीय भक्ति। जप में स्मरण = निरंतर देव का मन में होना।
सर्वोत्तम ध्यान
मैं जप कर रहा हूँ और भगवान सुन रहे हैं।' — यह सरल भाव सभी जटिल ध्यान विधियों से अधिक प्रभावशाली।





