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जप ध्यान📜 भागवत पुराण (7.5.23) — नवधा भक्ति, भगवद् गीता (9.34), पातंजल योग2 मिनट पठन

मंत्र जप के दौरान क्या ध्यान करना चाहिए?

संक्षिप्त उत्तर

जप में ध्यान: रूप ध्यान (चरण से मुकुट — विस्तार से)। गुण ध्यान (शिव = कल्याण, विष्णु = करुणा)। तत्व ध्यान (देव = ब्रह्म = आत्मा)। भागवत: 'स्मरणम्' — निरंतर देव का मन में होना। सरलतम: 'मैं जप कर रहा हूँ, भगवान सुन रहे हैं।'

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विस्तृत उत्तर

जप में ध्यान के विषय का वर्णन भागवत पुराण और भगवद् गीता में मिलता है:

तीन स्तरों पर ध्यान

1रूप ध्यान (प्रारंभिक साधक)

इष्ट देव का सुंदर स्वरूप — विस्तार से:

  • चरणों से प्रारंभ — नखों की आभा
  • ऊपर जाएं — घुटने, कमर, हृदय
  • मुख पर रुकें — नेत्र, मुस्कान, मुकुट
  • देव की दृष्टि — आप पर करुणा भाव

2गुण ध्यान (मध्यम साधक)

रूप से आगे — देव के गुणों का ध्यान:

  • शिव = 'कल्याण, चेतना, मोक्ष'
  • विष्णु = 'पालन, क्षमा, प्रेम'
  • देवी = 'शक्ति, माँ का ममत्व'

3तत्व ध्यान (उन्नत साधक)

भगवद् गीता: 'ब्रह्मण्याधाय कर्माणि' — सब कुछ ब्रह्म में समर्पित। देव = ब्रह्म = अपनी आत्मा = सब कुछ।

नवधा भक्ति में ध्यान

भागवत 7.5.23 — 'स्मरणम्' तृतीय भक्ति। जप में स्मरण = निरंतर देव का मन में होना।

सर्वोत्तम ध्यान

मैं जप कर रहा हूँ और भगवान सुन रहे हैं।' — यह सरल भाव सभी जटिल ध्यान विधियों से अधिक प्रभावशाली।
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शास्त्रीय स्रोत
भागवत पुराण (7.5.23) — नवधा भक्ति, भगवद् गीता (9.34), पातंजल योग
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