विस्तृत उत्तर
यह बहुत स्वाभाविक और ईमानदार प्रश्न है। जब नियमित पूजा के बावजूद अपेक्षित परिणाम न मिले तो मन निराश होता है। शास्त्रों में इसके कुछ कारण बताए गए हैं।
भाव की कमी — यदि पूजा केवल यांत्रिक रूप से हो रही है — बिना एकाग्रता, बिना भाव, केवल 'काम पूरा करने' के लिए — तो वह पूजा का बाहरी रूप है, आंतरिक नहीं। भगवान फूल नहीं, भाव देखते हैं।
मन में दोहरापन — यदि पूजा करते हैं और साथ ही झूठ, बेईमानी, दूसरों को कष्ट देना जारी हो — तो भक्ति और आचरण में विरोधाभास है।
प्रारब्ध — पुराने जन्मों के कर्मों का ऋण चुकाने में समय लगता है। पूजा उस प्रक्रिया को तेज करती है, पर रोक नहीं सकती।
जो माँगा वह उचित न हो — कभी-कभी जो माँगा वह हमारे लिए ठीक नहीं — भगवान जानते हैं इसलिए नहीं देते।
समय नहीं आया — प्रकृति के नियम से हर फल का एक समय होता है।
पूजा विधि में त्रुटि — कुछ विशेष अनुष्ठानों में विधि का महत्व है। किसी जानकार से मार्गदर्शन लें।
इस समय क्या करें:
पूजा छोड़ें नहीं — यही सबसे बड़ी भूल होगी। परिणाम न मिलने पर भी जारी रखें — यही सच्ची भक्ति है।
भाव को गहरा करें — फल की इच्छा थोड़ी कम करें, भगवान के प्रति प्रेम बढ़ाएँ।
आत्मनिरीक्षण करें — क्या आचरण में कोई कमी है? क्या किसी का कोई हक दबाया है?





