विस्तृत उत्तर
सामवेद भारतीय शास्त्रीय संगीत का मूल ग्रंथ है। इसे 'गानानां वेद' अर्थात गायन का वेद कहा जाता है और यह चारों वेदों में संगीत की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
सामवेद की संरचना — सामवेद में मुख्यतः ऋग्वेद के मंत्र लिए गए हैं और उन्हें विशेष सुर, ताल और लय में गाने की विधि बताई गई है। ये गाए जाने वाले मंत्र 'साम' कहलाते हैं। 'साम' शब्द का अर्थ गीत या संगीत है।
सात स्वरों का उद्गम — शास्त्रीय संगीत के सात स्वर — सा, रे, ग, म, प, ध, नि — का उद्गम सामवेदिक सप्तक (समगान) से माना जाता है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र और शार्ड्गदेव के संगीत रत्नाकर — दोनों का मूल स्रोत सामवेद है।
सामगान की विधि — सामवेद के मंत्रों को तीन तरह के स्वर-चिह्नों के साथ गाया जाता था — उदात्त (ऊँचा), अनुदात्त (नीचा), स्वरित (मध्यम)। ये तीन स्वर-भेद ही आगे चलकर भारतीय संगीत के तीन सप्तकों — मंद्र, मध्य और तार — का आधार बने।
आध्यात्मिक महत्व — सामवेद में कहा गया है कि इसके मंत्रों की धुन मन को शुद्ध करती है, आत्मा को ऊपर उठाती है और चेतना की उच्च अवस्थाओं का द्वार खोलती है। वैदिक यज्ञों में सामगान का विशेष स्थान था — उद्गाता ऋत्विज सामवेद के मंत्रों का गायन करते थे।




