विस्तृत उत्तर
मंत्र और संगीत का संबंध अत्यंत गहरा है — वास्तव में प्रत्येक मंत्र अपने आप में एक संगीत है।
मंत्र = ध्वनि + भाव — 'मंत्र' शब्द 'मन + त्र' से बना है — मन को त्राण देने वाला। मंत्र की शक्ति उसके उच्चारण की विशिष्ट ध्वनि में है। यदि वही शब्द सामान्य स्वर में बोला जाए, तो उसका प्रभाव कम हो जाता है। स्वर और उच्चारण की शुद्धता मंत्र की शक्ति को कई गुना बढ़ा देती है।
सामवेद की भूमिका — भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति सामवेद से मानी जाती है। ऋग्वेद के मंत्रों को गेय बनाकर सामवेद बनाया गया। सामवेद में ही सात स्वरों के प्रयोग का आदि रूप मिलता है। इसीलिए भारतीय संगीत को 'गंधर्व वेद' और 'पंचम वेद' कहते हैं।
मंत्र का संगीत-विज्ञान — प्रत्येक मंत्र के स्वर एक विशेष आवृत्ति पर कम्पित होते हैं जो मस्तिष्क और शरीर के विशिष्ट अंगों को प्रभावित करते हैं। 'ॐ' की ध्वनि की आवृत्ति 136.1 Hz होती है जो शरीर में ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन के उत्पादन को बढ़ाती है।
ताल और लय — मंत्र जप में ताल और लय का भी महत्व है। 108 माला जप में 108 बार की संख्या एक विशेष ताल-चक्र बनाती है जो मन को ध्यान की अवस्था में ले जाती है। नाद-विज्ञान के अनुसार लयबद्ध शब्द-उच्चारण मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों को संतुलित करता है।





