विस्तृत उत्तर
तांत्रिक दर्शन के अनुसार, ये ५१ अक्षर केवल भाषा के चिह्न नहीं हैं, बल्कि ये वे ५१ मूल ध्वनियाँ या आवृत्तियां (Frequencies) हैं जिनसे इस संपूर्ण ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है। जिस प्रकार आधुनिक भौतिकी क्वार्क-ग्लूऑन प्लाज्मा (Quark-Gluon Plasma) और हिग्स बोसोम (Higgs) के माध्यम से द्रव्यमान और ऊर्जा की रचना को समझती है, वैसे ही वेदांतिक और तांत्रिक दार्शनिकों ने ब्रह्मांड की ऊर्जा (शक्ति) के निर्माण को इन ५१ अक्षरों से जोड़ा है।
दक्ष प्रजापति के यज्ञ में जब माता सती ने आत्मदाह किया था, तो उनके शरीर के ५१ भाग गिरे थे, जो ५१ शक्तिपीठ बने। ये ५१ भाग ब्रह्मांडीय ऊर्जा के आधार हैं और वे ही संस्कृत के ५१ अक्षर हैं।





