विस्तृत उत्तर
शरणागति का शाब्दिक अर्थ है — किसी की शरण में जाना, उसके आश्रय को स्वीकार करना। आध्यात्मिक अर्थ में शरणागति का मतलब है — अपनी समस्त असमर्थता स्वीकार करके भगवान के चरणों में पूर्णतः समर्पित हो जाना।
भगवद्गीता के अंतिम उपदेश में श्रीकृष्ण ने कहा — 'सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।' — सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण आओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत करो।
शरणागति के छह अंग माने गए हैं —
- 1अनुकूलस्य संकल्पः — जो भगवान को प्रिय है वह करने का संकल्प
- 2प्रतिकूलस्य वर्जनम् — जो भगवान को अप्रिय है उसका त्याग
- 3रक्षिष्यतीति विश्वासः — 'भगवान मेरी रक्षा करेंगे' — यह दृढ़ विश्वास
- 4गोप्तृत्व-वरणम् — भगवान को ही अपना रक्षक मानना
- 5आत्मनिक्षेपः — अपनी आत्मा का भगवान के चरणों में समर्पण
- 6कार्पण्यम् — अपनी दीनता, असमर्थता का भाव
वैष्णव परंपरा में शरणागति को ही 'प्रपत्ति' कहते हैं। यह कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग से भी परे — सबसे सरल और शीघ्रफलदायी मार्ग माना जाता है।





