विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में मनुष्य को प्रातःकाल उठने के बाद भूमि पर पैर रखने से पूर्व एक विशेष विधि का पालन करने का विधान है। बिस्तर से उठने के पहले दाहिने हाथ की हथेली देखें — क्योंकि हथेली में लक्ष्मी, सरस्वती और गोविंद का वास माना गया है। इसके बाद पृथ्वी माता को दाहिने हाथ से स्पर्श करके इस मंत्र का उच्चारण करें — 'समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे।' अर्थात् — हे समुद्ररूपी वस्त्र धारण करने वाली, पर्वतरूपी स्तनों वाली, हे भगवान विष्णु की पत्नी पृथ्वी माता! आपको नमस्कार है, मेरे चरणों के स्पर्श को क्षमा करें। इसके बाद जो स्वर (श्वास) चल रहा हो, उसी ओर का पैर पहले भूमि पर रखें। पृथ्वी को माता के समान मानने की यह परंपरा वेदों से चली आ रही है। यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं, इसमें वैज्ञानिक तर्क भी है — रात भर कंबल-चादर में लिपटे पैरों का तापमान बढ़ा रहता है, इसलिए तुरंत पैर नीचे न रखकर कुछ क्षण रुकना शरीर के तापमान को सामान्य करता है। व्यवहारिक दृष्टि से यह परंपरा मनुष्य को विनम्रता, कृतज्ञता और धरती से जुड़ाव का भाव सिखाती है।




