विस्तृत उत्तर
सनातन परंपरा में प्रातःकाल उठकर पृथ्वी को नमन करने का गहरा धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व है। धार्मिक दृष्टि से — वेदों ने पृथ्वी को माता की संज्ञा दी है — 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः' (अथर्ववेद)। पृथ्वी को विष्णुपत्नी, भूदेवी कहा गया है। जिस प्रकार माँ के ऊपर पैर रखना अपमानजनक है, उसी प्रकार पृथ्वी पर बिना क्षमा माँगे पैर रखना उचित नहीं माना जाता। इसीलिए भूमि स्पर्श करते समय उससे क्षमा माँगी जाती है। दार्शनिक दृष्टि से — पृथ्वी हमारे शरीर का आधार है। हमारा शरीर पृथ्वी तत्त्व से बना है और अंततः पृथ्वी में ही विलीन होगा। अन्न, जल, वायु, औषधियाँ — सब पृथ्वी की देन हैं। प्रातःकाल इस कृतज्ञता का स्मरण दिन की सकारात्मक शुरुआत करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से — रात भर शरीर गर्म आवरण में रहने से पैरों का तापमान बढ़ जाता है। अचानक ठंडी भूमि पर पैर रखने से शरीर में तापमान का असंतुलन हो सकता है। पृथ्वी नमन के दौरान कुछ क्षण रुकने से पैरों का तापमान सामान्य होता है। यह परंपरा मनुष्य को अहंकार से मुक्त करके विनम्र और कृतज्ञ बनने की प्रेरणा भी देती है।
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