विस्तृत उत्तर
महापुराणों (विशेषकर मत्स्य और पद्म पुराण) के अनुसार, तिलधेनु दान 'पापमोचन' और 'चिंता-मुक्ति' का साधन है।
मृत्यु उपरांत इस दान का फल यह है कि साधक को एक कल्प तक 'शिव-लोक' या 'गौरी-लोक' की प्राप्ति होती है।
साथ ही 'मत्स्य पुराण' और 'पद्म पुराण' स्पष्ट करते हैं कि षट्तिला प्रयोग और मकरस्थ सूर्य की आराधना करने वाला व्यक्ति यमलोक की यातनाओं (वैतरणी नदी) से मुक्त होकर विष्णु-लोक या शिव-लोक में पूजित होता है।
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