विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में ध्यान का महत्व
उपनिषदों में ध्यान — ब्रह्म-साक्षात्कार का मार्ग
उपनिषदों में ध्यान (meditation) केवल मन की शांति का उपाय नहीं — वह ब्रह्म-साक्षात्कार की सीधी विधि है। बिना ध्यान के ब्रह्मज्ञान संभव नहीं।
माण्डूक्योपनिषद — तुरीय अवस्था
यह उपनिषद चेतना की चार अवस्थाएं बताता है:
- ▸जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति — तीनों में मन सक्रिय है
- ▸तुरीय — इन तीनों का साक्षी, निर्विकल्प अवस्था — यही शुद्ध ध्यान की परिणति है
*'प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।'* (7)
— शांत, कल्याणमय, अद्वैत चतुर्थ (तुरीय) ही आत्मा है — उसे जानना चाहिए। यही ध्यान का अंतिम फल है।
केनोपनिषद (4/4) — ध्यान का रहस्य
*'प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते।'*
— प्रत्येक बोध (अनुभव) में जो जाग्रत है — वही ब्रह्म है। ध्यान में इसी जाग्रत चेतना का साक्षात्कार होता है।
कठोपनिषद (2/24) — ध्यान की अनिवार्यता
*'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।'*
— आत्मा न प्रवचन से मिलती है, न बुद्धि से, न बहुत श्रवण से। वह केवल उसे ही प्राप्त होती है जिसे वह चुनती है — अर्थात जो एकाग्र ध्यान से उसकी ओर उन्मुख हो।
छान्दोग्य उपनिषद (7/6) — ध्यान सर्वश्रेष्ठ
*'ध्यानं वाव चित्तात्भूयः।'*
— ध्यान चित्त से भी श्रेष्ठ है। जो ध्यान करता है वह 'अहं ब्रह्मास्मि' का अनुभव करता है — वह संसार में स्वतंत्र विचरता है।
उपनिषदों में ध्यान के चरण
- 1इंद्रिय-संयम (प्रत्याहार)
- 2मन को ब्रह्म पर एकाग्र करना (धारणा)
- 3निरंतर एकाग्रता (ध्यान)
- 4ध्याता-ध्यान-ध्येय का एकत्व (समाधि)
ध्यान का अंतिम फल
बृहदारण्यक (3/8/11) — जो इस अक्षर ब्रह्म को जाने बिना इस लोक से जाता है, वह दीन है। जो जानकर जाता है — वह ब्रह्मवित् है।





