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वास्तु शास्त्र📜 मयमतम्, बृहत् संहिता, मत्स्य पुराण, समरांगण सूत्रधार3 मिनट पठन

वास्तु पुरुष कौन है और वास्तु मंडल क्या है

संक्षिप्त उत्तर

वास्तु पुरुष भूमि का अधिष्ठाता देवता है जो औंधे मुख (सिर ईशान, पैर नैऋत्य) लेटा है। वास्तु मंडल 81 पद (9×9) का ग्रिड है जिसमें 45 देवता विभिन्न स्थानों पर विराजमान हैं — केंद्र में ब्रह्मा। इसी के आधार पर भवन निर्माण किया जाता है।

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विस्तृत उत्तर

वास्तु पुरुष और वास्तु पुरुष मंडल वास्तु शास्त्र की मूल अवधारणाएं हैं जिन पर संपूर्ण वास्तु विज्ञान आधारित है।

वास्तु पुरुष कौन है

मत्स्य पुराण और बृहत् संहिता के अनुसार:

  1. 1सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी और अंधकासुर (कुछ संस्करणों में एक अज्ञात भूत) के बीच एक संघर्ष हुआ। एक विशाल प्राणी उत्पन्न हुआ जो आकाश और पृथ्वी दोनों को ढकने लगा।
  1. 1देवताओं ने मिलकर इस प्राणी को भूमि पर औंधे मुख गिराकर दबा दिया। 45 देवताओं ने इसके विभिन्न अंगों पर बैठकर इसे स्थिर किया।
  1. 1ब्रह्मा जी ने इस प्राणी को वरदान दिया कि 'तू भूमि का अधिष्ठाता देवता होगा — वास्तु पुरुष।' जो भी भूमि पर निर्माण करे, उसे तेरी पूजा करनी होगी।
  1. 1वास्तु पुरुष भूमि पर औंधे मुख (सिर ईशान कोण में, पैर नैऋत्य कोण में) लेटा हुआ माना जाता है।

वास्तु पुरुष मंडल

वास्तु पुरुष मंडल एक ज्यामितीय ग्रिड (grid) है जो किसी भी भूखंड या भवन पर आरोपित किया जाता है।

  1. 181 पद (9×9) मंडल — आवासीय भवनों के लिए। इसे 'परमशायिक मंडल' कहते हैं।
  2. 264 पद (8×8) मंडल — नगर/ग्राम नियोजन के लिए। इसे 'मंडूक मंडल' कहते हैं।

45 देवता और उनकी स्थिति

  • केंद्र (ब्रह्म स्थान) — ब्रह्मा (9 पद)
  • 32 बाह्य देवता — ईशान (शिव), इंद्र (पूर्व), अग्नि (आग्नेय), यम (दक्षिण), निऋति (नैऋत्य), वरुण (पश्चिम), वायु (वायव्य), कुबेर (उत्तर) — ये प्रमुख हैं। शेष 24 देवता परिधि के अन्य पदों पर विराजमान हैं।
  • 4 आंतरिक देवता — आप, आपवत्स, सविता, सवित्र

व्यावहारिक महत्व

वास्तु पुरुष मंडल के आधार पर ही प्रत्येक कमरे, द्वार, खिड़की का स्थान निर्धारित होता है। मर्म स्थान (वास्तु पुरुष के संवेदनशील बिंदु) पर खंभा, दीवार या भारी निर्माण वर्जित है।

ध्यान दें: वास्तु पुरुष की कथा प्रतीकात्मक है — यह भूमि पर ऊर्जा के वितरण को दर्शाती है। प्रत्येक दिशा में विशिष्ट देवता/ऊर्जा का वास — यह सिद्धांत निर्माण के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों पहलुओं को जोड़ता है।

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शास्त्रीय स्रोत
मयमतम्, बृहत् संहिता, मत्स्य पुराण, समरांगण सूत्रधार
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