रामायणअशोक वाटिका में सीता जी के पास कौन था?अशोक वाटिका में सीता जी की सबसे प्रमुख और सच्ची साथी त्रिजटा थीं, जो विभीषण की पुत्री और रामभक्त थीं। अन्य राक्षसियाँ सीता को प्रताड़ित करती थीं, पर त्रिजटा ने उन्हें हमेशा धैर्य और रामनाम से सहारा दिया।#अशोक वाटिका#सीता#त्रिजटा
लोकमार्कण्डेय पुराण में गंगा की चार धाराओं का वर्णन कैसे है?मार्कण्डेय पुराण में गंगा की चार धाराओं का विस्तृत भौगोलिक मार्ग बताया गया है — सीता (पूर्व-भद्राश्व), अलकनंदा (दक्षिण-भारतवर्ष), चक्षु (पश्चिम-केतुमाल), सोमा (उत्तर-उत्तरकुरु)।#मार्कण्डेय पुराण
लोकभूलोक पर गंगा की कितनी धाराएँ हैं?गंगा मेरु पर्वत से चार धाराओं में बँटती हैं — सीता (पूर्व), अलकनंदा/भागीरथी (दक्षिण), चक्षु (पश्चिम) और सोमा/भद्रा (उत्तर)।#गंगा#चार धाराएँ#सीता
देव कथाहनुमान जी को सिंदूर क्यों चढ़ाते — कथा?सीता: 'राम आयु हेतु सिंदूर।' हनुमान: 'चुटकी=लाभ, तो पूरा शरीर=राम अमर!' पूरे शरीर पर लगाया। इसलिए मूर्ति सिंदूर लेपित। नारंगी सिंदूर+चमेली तेल(मंगलवार)। भोलेपन+परम भक्ति।#हनुमान#सिंदूर#सीता
गौरी वंदना मंत्रसीता ने गौरी की पूजा क्यों की थी?सीता ने स्वयंवर से पूर्व मनोवांछित जीवनसाथी (श्रीराम) की प्राप्ति के लिए गौरी की पूजा की थी — यही कारण है कि यह प्रार्थना विवाह के लिए परम प्रमाण मानी जाती है।#सीता#गौरी पूजा#स्वयंवर
रामचरितमानस — बालकाण्ड'वैदेही' नाम क्यों पड़ा?विदेह (जनक) कुल में उत्पन्न — विदेह + ई = वैदेही (विदेह कुल की कन्या)। जनक वंश को 'विदेह वंश' कहते हैं क्योंकि राजा देह-भाव से परे (विरक्त) रहते थे।#बालकाण्ड#वैदेही#सीता
रामचरितमानस — बालकाण्ड'विदेहकुमारी' कौन हैं?सीताजी — राजा जनक (विदेह) की पुत्री। जनक को 'विदेह' कहते हैं (देह-भाव से परे)। सीताजी के अन्य नाम — जानकी, वैदेही, सीता, जनकसुता, भूमिजा।#बालकाण्ड#विदेहकुमारी#सीता
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी ने जयमाला किसे पहनाई?श्रीरामचन्द्रजी को — सखियों के साथ रंगभूमि में आकर। गुरुजनों की लाज से सकुचाती थीं पर हृदय में रामजी को रखकर प्रेमपूर्वक जयमाला पहनाई। सारे ब्रह्माण्ड में आनन्द छा गया।#बालकाण्ड#जयमाला#सीता
रामचरितमानस — बालकाण्डधनुष भंग के बाद सीताजी ने क्या किया?सीताजी ने चकित होकर रामजी को देखा — नेत्र अपना खजाना पाकर स्थिर हो गये। सखियों ने सीताजी को रामजी के समीप ले जाकर जयमाला पहनवायी। गुरुजनों की लाज से सकुचाती थीं पर हृदय में आनन्द था।#बालकाण्ड#सीता#जयमाला
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी ने वरदान पाकर लक्ष्मणजी और रामजी के बारे में क्या सोचा?पार्वती वरदान और नारद भविष्यवाणी के अनुसार सीताजी ने मन ही मन रामजी को अपना वर मान लिया। सखी ने कहा — पहले राजकुमार देख लो। रामजी को साँवला, सलोना, अनुपम सुन्दर पाया। जन्म-जन्मान्तर का शाश्वत प्रेम जागा।#बालकाण्ड#सीता#वरदान
रामचरितमानस — बालकाण्ड'प्रेम बिबस सीता पहिं आई' — कौन प्रेमविह्वल होकर सीताजी के पास आई?एक चतुर-सयानी प्रिय सखी — जिसने सीताजी को रामजी के बारे में बताया। उसके वचन सीताजी को प्रिय लगे, नेत्र अकुलाये। उसी सखी को आगे कर सीताजी चलीं। 'प्रीति पुरातन लखइ न कोई' — जन्म-जन्मान्तर का प्रेम।#बालकाण्ड#सखी#सीता
रामचरितमानस — बालकाण्डगिरिजा (पार्वती) की मूर्ति ने सीताजी को क्या वरदान दिया?पार्वती मूर्ति ने प्रसन्न होकर मुस्कुराई और वरदान दिया — मनवांछित वर (रामजी) मिलेंगे, मनोरथ पूर्ण होगा। सखियों ने मूर्ति का हिलना देखा — 'देवी प्रसन्न हुईं।' सीताजी को बड़ा हर्ष हुआ।#बालकाण्ड#पार्वती वरदान#सीता
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी ने श्रीरामजी को पहली बार देखकर क्या अनुभव किया?नारदजी के वचन स्मरण कर मन में पवित्र प्रीति जागी — 'जनु सिसु मृगी सभीत' — डरी हुई मृगछौनी की तरह चकित होकर चारों ओर देखने लगीं। दर्शन के लिये नेत्र अकुला उठे। जन्म-जन्मान्तर का प्रेम जाग उठा।#बालकाण्ड#सीता#प्रथम दर्शन
रामचरितमानस — बालकाण्डकिस सखी ने सीताजी को श्रीराम-लक्ष्मण के बारे में बताया?एक चतुर सयानी सखी ने — 'धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी' — हाथ पकड़कर कहा कि गिरिजा पूजन बाद में, पहले राजकुमार को देख लो। सखी के वचन सीताजी को अत्यन्त प्रिय लगे।#बालकाण्ड#सखी#सीता
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी ने माता पार्वती से कैसा वर माँगा?सीताजी ने सीधे शब्दों में नहीं कहा — 'मोर मनोरथु जानहु नीकें' — मेरा मनोरथ आप जानती हैं। नारदजी के वचन स्मरण कर मन में पवित्र प्रीति जागी — रामजी उनके वर बनें, यही हृदय भाव से प्रार्थना।#बालकाण्ड#सीता#पार्वती
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी पुष्पवाटिका में किसकी पूजा करने गयी थीं?गिरिजा (पार्वती/भवानी) की पूजा करने — माता ने भेजा था। 'तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥' सखियों के साथ आयीं, फूल चुने, फिर पार्वती मन्दिर में पूजा की।#बालकाण्ड#सीता#पुष्पवाटिका
आदर्श स्त्रीसीता जी से स्त्रियाँ क्या सीखें?धैर्य(लंका 11 माह), आत्मसम्मान(अग्निपरीक्षा+पृथ्वी), पतिव्रत+स्वतंत्रता(रावण ठुकराया), शिक्षा(विदुषी), करुणा। Strong+Compassionate दोनों। अपमान=स्वीकार नहीं।#सीता#आदर्श#शिक्षा