विस्तृत उत्तर
पार्वतीजी का वरदान पाकर और श्रीरामजी के दर्शन के बाद सीताजी के मन में अनेक भाव उत्पन्न हुए।
पुष्पवाटिका में जब दोनों भाई लतामण्डप (कुञ्ज) से प्रकट हुए — 'मानो दो निर्मल चन्द्रमा बादलोंके पर्देको हटाकर निकले हों' — तब सीताजी ने उनकी शोभा का वर्णन मन में किया।
सीताजी ने सोचा — ये साँवले कुँवर (रामजी) बहुत ही सलोने हैं। सखी ने हाथ पकड़कर कहा — 'गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू' — गिरिजा का ध्यान बाद में, पहले राजकुमार को देख लो।
इसके बाद सीताजी ने मन ही मन रामजी को अपना वर मान लिया — यह पार्वतीजी के वरदान और नारदजी की भविष्यवाणी का फल था। दोनों का प्रेम जन्म-जन्मान्तर का शाश्वत प्रेम है।





