विस्तृत उत्तर
सीताजी ने श्रीरामजी को पहली बार देखकर मन में पवित्र प्रीति का अनुभव किया। नारदजी के वचनों का स्मरण करके उनके हृदय में प्रेम जाग उठा।
दोहा — 'सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत। चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत॥'
अर्थ — नारदजीके वचनोंका स्मरण करके सीताजीके मनमें पवित्र प्रीति उत्पन्न हुई। वे चकित होकर सब ओर इस तरह देख रही हैं मानो डरी हुई मृगछौनी (हिरणी का बच्चा) इधर-उधर देख रही हो।
सखी के वचन सुनकर सीताजी को रामजी अत्यन्त प्रिय लगे — 'तासु बचन अति सियहि सोहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने' — दर्शन के लिये नेत्र अकुला उठे। फिर सीताजी उसी प्यारी सखी को आगे करके चलीं — 'चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई' — पुरानी प्रीति (जन्म-जन्मान्तर का प्रेम) को कोई लख नहीं पाता।





