विस्तृत उत्तर
जब रावण ने माता सीता का हरण कर उन्हें लंका की अशोक वाटिका में बंदी बनाया, तब वहाँ उनकी देखरेख के लिए अनेक राक्षसियाँ नियुक्त की गई थीं। इनमें से अधिकांश सीता जी को डराती और रावण से विवाह करने पर दबाव बनाती थीं। परंतु उन सबमें एक थीं त्रिजटा — जो सीता की सच्ची सहायक और रामभक्त थीं।
त्रिजटा रावण के भाई विभीषण की पुत्री थीं। विभीषण के स्वयं रामभक्त होने के कारण त्रिजटा के भीतर भी जन्म से ही राम के प्रति श्रद्धा थी। मंदोदरी ने सीता जी की विशेष देखरेख के लिए त्रिजटा को नियुक्त किया था। वे राक्षसी कुल में जन्मी होने के बावजूद सीता की हितचिंतक और रक्षक थीं।
त्रिजटा ने अन्य राक्षसियों को सीता पर अत्याचार करने से रोका। उन्होंने सीता को धैर्य बँधाया और बार-बार यह विश्वास दिलाया कि श्रीराम अवश्य आएंगे और उन्हें मुक्त कराएंगे। एक बार त्रिजटा ने सोकर उठने पर अपना एक भयंकर स्वप्न अन्य राक्षसियों को सुनाया जिसमें उन्होंने रावण का पतन और राम की विजय देखी थी — यह उनकी दिव्यदृष्टि का परिचायक था।
रामचरितमानस में तुलसीदास ने त्रिजटा का वर्णन करते हुए कहा है — 'त्रिजटा नाम राच्छसी एका, राम चरन रति निपुन बिबेका' — वह राम के चरणों में अनुराग रखने वाली, व्यवहार-कुशल और विवेकशील थीं। सीता माता ने त्रिजटा को पुत्रवत स्नेह दिया। युद्ध समाप्ति के बाद त्रिजटा अयोध्या भी गई जहाँ उन्होंने माता सीता की सेवा की।





