विस्तृत उत्तर
रामायण और महाभारत के महाकाव्यों में वर्णित युद्धों में योद्धाओं के तरकश में सामान्य बाणों के साथ-साथ ऐसे अस्त्र भी होते थे जिन्हें मंत्रों की शक्ति से जागृत किया जाता था। ये 'दिव्यास्त्र' कहलाते थे। ये मात्र हथियार नहीं, बल्कि देवताओं की शक्ति के मूर्त रूप थे, जिन्हें विशिष्ट मंत्रों के उच्चारण से आह्वान किया जाता था। प्रत्येक दिव्यास्त्र का एक अधिष्ठाता देवता होता था, और वह अस्त्र उसी देवता की शक्ति और स्वभाव को धारण करता था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इन दिव्यास्त्रों की उत्पत्ति ब्रह्मांड की रक्षा के लिए हुई थी। भगवान विष्णु ने स्वयं अपने सुदर्शन चक्र की ऊर्जा से सौ से अधिक अस्त्रों का निर्माण किया था, ताकि सृष्टि को अधर्म की शक्तियों से बचाया जा सके।
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