विस्तृत उत्तर
माता सीता का जन्म अलौकिक और अत्यंत दिव्य है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार उनका प्राकट्य भूमि से हुआ था, इसलिए वे 'भूमिजा' और 'पृथ्वी-पुत्री' कहलाईं।
त्रेतायुग में मिथिला राज्य में भयंकर सूखा पड़ा। ऋषियों ने राजा जनक को परामर्श दिया कि यदि वे स्वयं हल चलाएँ तो इंद्रदेव प्रसन्न होंगे और वर्षा होगी। राजा जनक ने यज्ञ की भूमि तैयार करने के लिए हल चलाया। वाल्मीकि रामायण के अनुसार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुष्य नक्षत्र में, जब जनक हल चला रहे थे, तब हल की नोक (जिसे 'सीत' कहते हैं) एक कलश से टकराई। उस कलश से एक अत्यंत तेजस्वी, सुंदर कन्या प्रकट हुई।
हल की नोक को 'सीत' कहते हैं और उससे स्पर्श होकर प्रकट होने के कारण ही इस दिव्य कन्या का नाम 'सीता' पड़ा। राजा जनक निःसंतान थे। उन्होंने इस कन्या को ईश्वर का वरदान मानकर अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। जनक की पुत्री होने के कारण 'जानकी', मिथिला में जन्म के कारण 'मैथिली' और 'मिथिलेशकुमारी' उनके अन्य नाम पड़े।
वाल्मीकि रामायण यह भी बताती है कि श्रीराम के जन्म के लगभग सात वर्ष एक माह बाद सीता का प्राकट्य हुआ था। पद्मपुराण में उन्हें जगतमाता और अध्यात्म रामायण में योगमाया का साक्षात स्वरूप कहा गया है।





