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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

'प्रेम बिबस सीता पहिं आई' — कौन प्रेमविह्वल होकर सीताजी

एक चतुर-सयानी प्रिय सखी — जिसने सीताजी को रामजी के बारे में बताया। उसके वचन सीताजी को प्रिय लगे, नेत्र अकुलाये।

संक्षिप्त उत्तर

एक चतुर-सयानी प्रिय सखी — जिसने सीताजी को रामजी के बारे में बताया। उसके वचन सीताजी को प्रिय लगे, नेत्र अकुलाये। उसी सखी को आगे कर सीताजी चलीं। 'प्रीति पुरातन लखइ न कोई' — जन्म-जन्मान्तर का प्रेम।

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विस्तृत उत्तर

यह प्रसंग एक सयानी (चतुर) सखी का है जो सीताजी के अत्यन्त निकट थी। उसी सखी ने सीताजी को रामजी के बारे में बताया और उनके दर्शन कराये।

बालकाण्ड में कहा — 'तासु बचन अति सियहि सोहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने। चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई॥'

अर्थ — उसके वचन सीताजीको अत्यन्त ही प्रिय लगे और दर्शनके लिये उनके नेत्र अकुला उठे। उसी प्यारी सखीको आगे करके सीताजी चलीं। पुरानी प्रीतिको कोई लख नहीं पाता।

यह सखी सीताजी और रामजी के प्रथम मिलन में माध्यम बनी — उसने सीताजी को रामजी दिखाये और गिरिजा-पूजन के बहाने दर्शन कराया। 'प्रीति पुरातन' — जन्म-जन्मान्तर का प्रेम — इसका संकेत है कि यह सम्बन्ध शाश्वत है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

'प्रेम बिबस सीता पहिं आई' — कौन प्रेमविह्वल होकर सीताजी के पास आई को संदर्भ सहित समझें

'प्रेम बिबस सीता पहिं आई' — कौन प्रेमविह्वल होकर सीताजी के पास आई का सबसे सीधा सार यह है: एक चतुर-सयानी प्रिय सखी — जिसने सीताजी को रामजी के बारे में बताया। उसके वचन सीताजी को प्रिय लगे, नेत्र अकुलाये। उसी सखी को आगे कर सीताजी चलीं।...

रामचरितमानस — बालकाण्ड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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