विस्तृत उत्तर
सीताजी ने माता पार्वती से सीधे शब्दों में वर नहीं माँगा — बल्कि कहा कि मेरा मनोरथ आप भलीभाँति जानती हैं, क्योंकि आप सबके हृदय में बसती हैं, इसलिये प्रकट नहीं कहा।
वास्तव में सीताजी के मन में नारदजी के वचन थे — नारदजी ने पहले आकर कहा था कि सीताजी को एक विशेष वर मिलेगा। सीताजी ने रामजी को देखकर मन ही मन उन्हें अपना वर मान लिया था।
दोहा — 'सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत। चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत॥'
अर्थ — नारदजीके वचनोंका स्मरण करके सीताजीके मनमें पवित्र प्रीति उत्पन्न हुई। वे चकित होकर सब ओर इस तरह देख रही हैं मानो डरी हुई मृगछौनी इधर-उधर देख रही हो।
सीताजी ने पार्वती से यही प्रार्थना की कि वे साँवले राजकुमार (रामजी) उनके वर बनें — बिना शब्दों में कहे, केवल हृदय भाव से।





