विस्तृत उत्तर
कुछ परंपराओं में इसे स्वयं-सिद्ध माना जाता है क्योंकि इसका लाभ और संरक्षण पहले पाठ के तुरंत बाद ही मिलना प्रारम्भ हो जाता है। इसे सिद्ध करने के लिए लंबे अनुष्ठान की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।
इसे स्वयं-सिद्ध इसलिए कहते हैं क्योंकि इसका असर पहले ही पाठ से तुरंत शुरू हो जाता है।
कुछ परंपराओं में इसे स्वयं-सिद्ध माना जाता है क्योंकि इसका लाभ और संरक्षण पहले पाठ के तुरंत बाद ही मिलना प्रारम्भ हो जाता है। इसे सिद्ध करने के लिए लंबे अनुष्ठान की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।
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