विस्तृत उत्तर
जब कवच सिद्ध हो जाता है, तब साधक को उसका पाठ करने की आवश्यकता नहीं रहती; साधक स्वयं 'कवच' बन जाता है। वह स्वयं उसी 'शिव-रूप' में ढल जाता है जिसका वह निरंतर न्यास कर रहा था।
सिद्ध होने का अर्थ है साधक का स्वयं कवच बन जाना और पूरी तरह शिव-रूप में रूपांतरित होना।
जब कवच सिद्ध हो जाता है, तब साधक को उसका पाठ करने की आवश्यकता नहीं रहती; साधक स्वयं 'कवच' बन जाता है। वह स्वयं उसी 'शिव-रूप' में ढल जाता है जिसका वह निरंतर न्यास कर रहा था।
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