विस्तृत उत्तर
भगवान के नाम में पाप-नाश की शक्ति क्यों है — इसके उत्तर में शास्त्र और अनुभव दोनों एक स्वर में बोलते हैं।
शास्त्रीय आधार — श्रीमद्भागवत में स्पष्ट कहा गया है कि भगवान का नाम प्रेम से, बिना प्रेम के, किसी संकेत के रूप में, हंसी-मजाक में, या यहाँ तक कि अपमान के रूप में भी लिया जाए — उससे मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं — 'राम राम कहि जो जमुहाहीं, तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं' — अर्थात जो भगवान का नाम लेकर जम्हाई भी लेते हैं, उनके पाप-समूह सामना नहीं कर सकते।
दार्शनिक कारण — भगवान का नाम और भगवान दो पृथक सत्ताएँ नहीं हैं। जब हम 'राम' या 'कृष्ण' नाम उच्चारित करते हैं तो वह केवल शब्द नहीं, स्वयं परमात्मा का आह्वान है। जैसे अग्नि का नाम लेने से हाथ नहीं जलता परंतु अग्नि स्वयं जलाती है — उसी प्रकार भगवन्नाम स्वयं भगवान के समान फलदायी है, यह शक्ति नाम की विशेषता है।
मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक दृष्टि — जब हम किसी पवित्र नाम को बार-बार उच्चारित करते हैं तो मस्तिष्क की अल्फा तरंगें सक्रिय होती हैं, पिट्यूटरी और एड्रिनल ग्रंथियों के स्रावों में परिवर्तन आता है जिससे भाव-शुद्धि होती है। जब भाव शुद्ध होता है तो पाप-प्रवृत्तियाँ स्वतः क्षीण होती हैं।
रामचरितमानस का संदेश — 'कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा॥' — कलियुग में भगवान के नाम और गुण-गान ही तारने का एकमात्र आधार है।





