विस्तृत उत्तर
परिक्रमा (प्रदक्षिणा) का महत्त्व और उसके कारण विष्णु पुराण तथा आगम शास्त्रों में विस्तार से वर्णित हैं।
प्रदक्षिणा का अर्थ
प्रदक्षिणा' = 'प्र' (विशेष) + 'दक्षिण' (दाहिनी ओर)। देवता को अपनी दाहिनी ओर रखते हुए घूमना।
शास्त्रीय प्रमाण
विष्णु पुराण: 'यानि कानि च पापानि जन्मांतरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यंति प्रदक्षिणपदे पदे।।' — परिक्रमा के प्रत्येक पग पर जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं।
परिक्रमा के पाँच कारण
1देव-ऊर्जा का चक्र
आगम शास्त्र: मंदिर की मूर्ति के चारों ओर देवता की ऊर्जा-तरंगें होती हैं। परिक्रमा = उस ऊर्जा-क्षेत्र में भ्रमण। यह ऊर्जा शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डालती है।
2ब्रह्माण्डीय गति का अनुसरण
स्कंद पुराण: सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की परिक्रमा, पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की परिक्रमा — परमात्मा के चारों ओर जीव की परिक्रमा उसी नियम का अनुसरण है।
3पाप-क्षय
विष्णु पुराण: प्रत्येक कदम पर पाप नष्ट।
4विनम्रता
देवता को केंद्र में रखकर घूमना = 'आप केंद्र हैं, मैं आपके चारों ओर हूँ।' — अहंकार का विसर्जन।
5मंत्र-ऊर्जा का संचय
परिक्रमा के दौरान मंत्र-जप = घूमते हुए मंत्र-ऊर्जा का संचय।
परिक्रमा-संख्या
शिव — अर्धपरिक्रमा (जलधारी पार न करें)। विष्णु — 4। सूर्य — 7। गणेश — 3। दुर्गा — 1 या 3।





