विस्तृत उत्तर
भगवान शिव, जो विश्व-कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, ने बिना किसी भय के, सृष्टि की रक्षा हेतु उस संपूर्ण कालकूट विष को अपने हाथ में लेकर पान कर लिया।
जब इस प्रलयंकारी संकट से बचने का कोई उपाय नहीं सूझा और समस्त देवगण और ऋषिगण भगवान शिव की शरण में पहुँचे, तब शिव ने संपूर्ण सृष्टि को बचाने के लिए यह महान त्याग किया।
नीलकंठ महादेव का यह चरित्र यह प्रेरणा देता है कि दूसरों के कष्टों को स्वयं पर धारण करना ही सच्चा 'शिवत्व' है।





