विस्तृत उत्तर
एक महत्त्वपूर्ण आख्यान (रामचरितमानस में वर्णित) यह है कि विषपान करते समय भगवान शिव ने अपने इष्ट श्रीराम के नाम का स्मरण किया था।
कहा जाता है कि नाम के प्रभाव से ही भयंकर कालकूट विष शिव के लिए अमृत सदृश हो गया था (नाम प्रभाउ जान सिव नीको, कालकूट फलु दीन्ह अमी को)।
यह संदर्भ यह स्थापित करता है कि नीलकंठ स्वरूप की शक्ति केवल तांत्रिक बीजों या मंत्रों पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, विश्वास और नाम-स्मरण के समन्वय से भी सिद्ध होती है।





