विस्तृत उत्तर
शिव की बारात को देखकर माता मेना — पार्वती जी की माँ — का हृदय टूट गया और उनकी दशा अत्यंत करुण हो गई।
जब बारात द्वार पर पहुँची, तो पहले लड़कों ने दौड़कर इस विचित्र बारात का वृत्तांत घर में आकर सुनाया। उन्होंने कहा — 'दूल्हा पागल है, बैल पर सवार है, शरीर पर राख लगाए हैं, गले में साँप और कपाल के गहने हैं, जटाधारी है और उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच और राक्षस हैं।' यह सुनकर घर की सभी स्त्रियाँ भाग गईं।
माता मेना शुभ आरती सजाकर और अपनी सहेलियों के साथ मंगल-गीत गाती हुई परछन करने निकलीं। परंतु जब उन्होंने शिव जी का भयानक वेष — भस्म, नागों का जनेऊ, जटाजूट, त्रिशूल, नरमुण्डों की माला — देखा, तो उनके मन में भय समा गया। वे रोने और विलाप करने लगीं।
रोती हुई मेना कहने लगीं — 'मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और पार्वती को इस बावले वर के लिए कठोर तप करने की सलाह दी।' यह देखकर माता पार्वती विवेकपूर्ण कोमल वाणी में बोलीं — 'हे माता! जो विधाता ने रच दिया है, वह टलता नहीं। यदि मेरे भाग्य में यही पति लिखा है तो किसी को क्यों दोष दें?' अंत में नारद जी ने शिव के गुण, शक्ति और पूर्वजन्म की कथा सुनाकर सबको समझाया और तब जाकर मेना तथा हिमालय माने।





