विस्तृत उत्तर
शिवजी की बारात अत्यन्त विचित्र थी। इसमें शामिल थे:
चौपाई — 'जस दूलहु तसि बनी बाराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥'
अर्थ — जैसा दूल्हा है, वैसी ही बारात बन गयी है। मार्गमें चलते हुए भाँति-भाँतिके कौतुक (तमाशे) होते जाते हैं।
बारात में शामिल थे:
- ▸भूत, प्रेत, पिशाच
- ▸योगिनियाँ और राक्षस
- ▸विभिन्न प्रकार के गण — कोई अंगहीन, कोई बहुत अंगवाला
- ▸भयानक मुखवाले प्राणी
- ▸नन्दी (शिवजी का बैल)
छन्द में वर्णन — 'तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा। संग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा॥'
अर्थ — दूल्हेके शरीरपर राख लगी है, साँप और कपालके गहने हैं; वह नग्न, जटाधारी और भयङ्कर है। उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं।
इसके विपरीत देवताओं का दल अत्यन्त सुन्दर और शोभायमान था — विष्णुजी को देखकर सब सुखी हुए। पर शिवजी का दल देखकर सबके वाहन (हाथी, घोड़े, रथ) डरकर भाग चले।




