विस्तृत उत्तर
भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की बारात पुराणों में वर्णित सबसे अनोखी और अद्भुत बारात है। शिव पशुपति हैं — समस्त प्राणियों के देवता — इसलिए उनकी बारात में संसार के सभी जीव-जंतु, देवता, दानव, गण और योनियाँ शामिल थीं।
बारात के अग्रभाग में भगवान ब्रह्मा और विष्णु थे। माता गायत्री, सावित्री, सरस्वती और लक्ष्मी भी बारात की शोभा बढ़ा रही थीं। देवराज इंद्र अपने समस्त देवताओं सहित और कुबेर यक्षों व गंधर्वों के साथ चल रहे थे। सप्तर्षि स्वस्ति-गान करते हुए आगे बढ़ रहे थे।
शिव जी के गण — शंखकर्ण, कंकराक्ष, विकृत, विशाख, वीरभद्र और अन्य असंख्य गण — अत्यंत विचित्र वेष में थे। कोई बिना मुख का था, किसी के बहुत से मुख थे, कोई बिना हाथ-पैर का था तो किसी के कई हाथ-पैर थे। कुछ के मुख गधे, कुत्ते, सूअर और सियार जैसे थे। सभी शरीर में भस्म लगाए और हाथों में कपाल धारण किए थे।
इनके साथ असंख्य भूत, पिशाच, राक्षस, प्रेत और योगिनियाँ भी थीं। यक्ष, गंधर्व, अप्सराएं, किन्नर, नाग और ब्रह्मराक्षस सभी बारात में शामिल थे। बारात का भार इतना अधिक था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर एक ओर झुकने लगी — तब शिव जी ने महर्षि अगस्त्य को दक्षिण दिशा में भेजा और पृथ्वी का संतुलन ठीक हुआ। स्वयं शिव जी नंदी पर सवार होकर बारात में अग्रेसर थे।





