विस्तृत उत्तर
भगवान शिव ने पार्वती की तपस्या और प्रेम की परीक्षा लेने के लिए सुनटनर्तक (नाचने वाले ब्राह्मण भिक्षु) का रूप धारण किया था।
शिव पुराण और रामचरितमानस दोनों में यह कथा आती है। माता पार्वती ने वर्षों की कठोर तपस्या करके शिव को प्रसन्न किया था। शिव यह देखना चाहते थे कि पार्वती का उनके प्रति प्रेम और निश्चय कितना गहरा है — क्या वे किसी की बुरी बात सुनकर मन बदल लेती हैं या नहीं।
इसीलिए शिव जी एक ब्राह्मण का रूप धारण करके पार्वती के पास आए और उनके सामने स्वयं शिव की अनेक प्रकार से निंदा करने लगे। उन्होंने कहा — 'शिव श्मशानवासी हैं, औघड़ हैं, इनका कोई घर-परिवार नहीं है, ये भस्म और सर्पों से सजे रहते हैं, इनके माता-पिता भी नहीं हैं।' उन्होंने पार्वती को किसी अच्छे कुल के राजकुमार से विवाह करने की सलाह दी।
पार्वती ने यह सुनकर अत्यंत क्रोध व्यक्त किया और उस ब्राह्मण से कहा कि वे जाएं, वे शिव के अतिरिक्त किसी और को पति नहीं मानतीं। जब ब्राह्मण ने बार-बार शिव की निंदा की, तो पार्वती वहाँ से जाने को उठीं। तब शिव जी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गए और पार्वती की अटूट भक्ति और दृढ़ प्रेम को स्वीकार किया। इस प्रकार परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद ही शिव ने विवाह का प्रस्ताव दिया।




