विस्तृत उत्तर
भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह त्रयुगीनारायण (रुद्रप्रयाग के निकट) में संपन्न हुआ था। इस दिव्य विवाह में ब्रह्मा जी पुरोहित बने और भगवान विष्णु ने पार्वती के भाई की भूमिका निभाई।
शिव पुराण के अनुसार इस विवाह में वैदिक परंपरा के अनुसार समस्त विधि-विधान का पालन किया गया। वर-वधू की वंशावली का उद्घोष हुआ। हिमालय ने कन्यादान दिया और शिव को दहेज में अनेक वस्तुएं अर्पित कीं। विवाह की अग्नि प्रज्वलित की गई और दोनों ने अग्नि के समक्ष वचन लिए।
सप्तपदी — सात फेरे — हिंदू विवाह का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है जो अग्निदेव को साक्षी मानकर किया जाता है। शिव-पार्वती विवाह में भी यह विधान था। सात फेरों के सात वचन हैं जो वर-वधू आपस में लेते हैं — जिनमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और प्रत्येक जन्म में साथ रहने की प्रतिज्ञा शामिल है। शिव पुराण में बताया गया है कि शिव ने लोकाचार का पालन करते हुए विवाह के सभी मंत्रों का उच्चारण किया। शिवजी ने काम-मंत्र का पाठ किया और सभी ओर जय-जयकार गूंज उठी। इस विवाह के आदर्श की स्मृति में आज भी हर हिंदू विवाह में सात फेरों की परंपरा का पालन होता है।





