विस्तृत उत्तर
माता मैना ने शिवजी की विचित्र बारात देखकर बड़ा विलाप किया। उन्होंने नारदजी को दोषी ठहराया।
दोहा — 'भई बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि। करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि॥'
इसका अर्थ — हिमाचलकी स्त्री (मैना) को दुःखी देखकर सारी स्त्रियाँ व्याकुल हो गयीं। मैना अपनी कन्याके स्नेहको याद करके विलाप करती, रोती और कहती थीं—
चौपाई — 'नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा। अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा॥'
अर्थ — मैंने नारदका क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और जिन्होंने पार्वतीको ऐसा उपदेश दिया कि उसने बावले वरके लिये तप किया।
आगे मैना ने शिवजी की खुलकर निन्दा की — 'साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया। पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा॥'
अर्थ — सचमुच उनके न किसीका मोह है, न माया, न धन है, न घर है और न स्त्री ही है। वे सबसे उदासीन हैं, दूसरेका घर उजाड़नेवाले हैं, उन्हें न लाज है न डर। बाँझ स्त्री प्रसवकी पीड़ाको क्या जाने!





