विस्तृत उत्तर
रामचरितमानस के बालकाण्ड का आरम्भ मंगलाचरण से होता है। इसमें सबसे पहले संस्कृत श्लोकों में वर्णनानुगमिनी वन्दना की गई है — जिसमें भगवान शंकर एवं माता पार्वती (श्लोक 1), वाल्मीकि-हनुमान (श्लोक 2), माता सीता (श्लोक 5) और भगवान हरि (श्लोक 6) की स्तुति है।
इसके बाद अवधी छन्दों में सबसे पहली सोरठा में श्रीगणेशजी की वन्दना है — 'जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन। करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥'
इसका अर्थ है — जिनके स्मरण मात्र से सब कार्य सिद्ध होते हैं, जो गणों के स्वामी हैं और सुन्दर हाथी के समान मुखवाले हैं, वे बुद्धि की राशि और शुभ गुणों के धाम (श्रीगणेशजी) मुझपर कृपा करें।
हिन्दू परम्परा में किसी भी शुभ कार्य का आरम्भ गणेशजी की वन्दना से होता है, तुलसीदासजी ने भी इसी विधान का पालन किया।





