विस्तृत उत्तर
जब शिवजी को ध्यान द्वारा पता चला कि सतीजी ने सीताजी का रूप धारण किया था, तो उनके हृदय में बड़ा विषाद हुआ। उन्होंने मन-ही-मन सतीजी का पत्नी रूप में त्याग करने का संकल्प कर लिया।
चौपाई — 'सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा। जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥'
इसका अर्थ — सतीजीने सीताजीका वेष धारण किया, यह जानकर शिवजीके हृदयमें बड़ा विषाद हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि मैं अब सतीसे प्रीती करता हूँ तो भक्तिमार्ग लुप्त हो जाता है और बड़ा अन्याय होता है।
दोहा — 'परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु। प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥'
अर्थ — सती परम पवित्र हैं, इसलिये इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करनेमें बड़ा पाप है। प्रकट करके महादेवजी कुछ भी नहीं कहते, परन्तु उनके हृदयमें बड़ा सन्ताप है।
फिर शिवजी ने श्रीरामजी का स्मरण करते हुए मन में संकल्प किया — 'एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥' अर्थ — सतीके इस शरीरसे मेरी (पति-पत्नीरूपमें) भेंट नहीं हो सकती — शिवजीने अपने मनमें यह संकल्प कर लिया।
कारण — सतीजी ने सीता रूप धारण किया, अतः शिवजी की दृष्टि में वे माता (सीता) के समान हो गयीं, उनसे पत्नी-भाव रखना भक्तिमार्ग के विरुद्ध है।





