विस्तृत उत्तर
शास्त्रों ने स्वर्ण निर्मित श्रीयंत्र को 'उत्तम' कहा है। इसका फल 'अनंतगुणा' होता है और यह यंत्र 'आजीवन' फलदायी रहता है।
स्वर्ण, जो स्वयं अग्निदेव का वीर्य और अक्षय ऊर्जा का प्रतीक है, यंत्र में प्रतिष्ठित मंत्र-चेतना को अनंत काल तक धारण करने और विकीर्ण करने की क्षमता रखता है।
यह एक ऐसी दिव्य बैटरी के समान है जो कभी क्षीण नहीं होती।




